गांगुली-धोनी और कोहली से पहले आया था वो कप्तान, जिसने भारत को विदेशों में जीतना सिखाया



भारतीय क्रिकेट में जब भी सबसे बेहतरीन कप्तानों की बात होगी, तो स्वाभाविक रूप से महेंद्र सिंह धोनी, कपिल देव, विराट कोहली और सौरव गांगुली जैसे नाम हर किसी की जुबान पर सबसे पहले आएंगे. जब चर्चा थोड़ा बढ़ेगी तो मंसूर अली खान पटौदी, बिशन सिंह बेदी, सुनील गावस्कर, लाला अमरनाथ जैसे दिग्गजों के नाम आएंगे. ये सब अपने आप में बेहतरीन कप्तान और महान खिलाड़ी रहे हैं.

लेकिन अक्सर एक नाम जो किसी न किसी कारण से दबा रह जाता है, वह है अजीत वाडेकर (Ajit Vadekar). एक ऐसा कप्तान जिसका न सिर्फ कप्तानी का कार्यकाल छोटा रहा, बल्कि पूरा करियर ही उम्मीद के मुताबिक बढ़ नहीं सका और उसकी वजह भी कप्तानी रही. टाइगर पटौदी ने अगर भारत को विदेशी जमीन पर पहली सीरीज जीत दिलाई, तो वा़डेकर ने टीम में विदेशों में जीतने की आदत डाली.

बाएं हाथ के स्टाइलिश बम्बइया बल्लेबाज अजीत वाडेकर का जन्म आज ही के दिन हुआ था. 1 अप्रैल 1941 को मुम्बई (तब बम्बई) में जन्मे अजीत वाडेकर ने अपने पिता के इंजीनियर बनाने के ख्वाब को पूरा करने के बजाए क्रिकेटर बनने के अपने सपने का पीछा किया और 1958-59 में बम्बई की टीम के लिए रणजी ट्रॉफी में डेब्यू किया. घरेलू क्रिकेट में जमकर रन बनाने के बावजूद अजीत वाडेकर को भारतीय टीम में जगह बनाने के लिए करीब 8 साल का इंतजार करना पड़ा.

टेस्ट डेब्यू और पहली सीरीज जीत के नायक

1966 में वेस्टइंडीज के खिलाफ बम्बई के ब्रेबॉर्न स्टेडियम में वाडेकर ने अपना डेब्यू किया. करियर की तीसरी ही पारी में उन्होंने अर्धशतक जमाया और फिर इसके बाद से वह लगातार टीम इंडिया की बैटिंग का अहम हिस्सा बन गए. इस दौरान उन्होंने कई अर्धशतकीय पारियां खेलीं. अपनी कप्तानी में विदेशी जमीन पर सीरीज जिताने से पहले पहले वाडेकर ने अपनी बल्लेबाजी से भारत की विदेश में पहली टेस्ट सीरीज जीत में मदद की थी.

टाइगर पटौदी की कप्तानी में भारतीय टीम ने न्यूजीलैंड को 4 मैचों की सीरीज में 3-1 से हराया था. वाडेकर ने इस सीरीज में एक शतक (143- वेलिंग्टन टेस्ट) और 2 अर्धशतक समेत भारत के लिए सबसे ज्यादा 328 रन बनाए. वेलिंग्टन में लगाया शतक वाडेकर के करियर का इकलौता शतक था और उसने भारत को जीत दिलाई थी.
1971- भारतीय क्रिकेट का सबसे शानदार साल

3 साल बाद 1971 में जब भारतीय टीम वेस्टइंडीज के दौरे पर जा रही थी, तो चयनकर्ताओं ने सबको चौंकाते हुए पटौदी की जगह वाडेकर को कप्तान बना दिया. भारत ने इससे पहले वेस्टइंडीज के खिलाफ सीरीज जीतना तो दूर की बात, कोई टेस्ट मैच भी नहीं जीता था. वाडेकर की कप्तानी में सुनील गावस्कर ने पोर्ट ऑफ स्पेन में हुए दूसरे टेस्ट में डेब्यू किया और भारत ने इस टेस्ट को जीतकर विंडीज दिग्गजों के खिलाफ अपना पहला हल्ला बोला. 5 मैचों की ये सीरीज भारत 1-0 से जीतने में सफल रहा.

1971 सही मायनों में भारत के लिए सबसे अहम साल था. इसने भारतीय क्रिकेट को नई दिशा देने का काम किया था और इसके सूत्रधार कप्तान वाडेकर ही थे. वेस्टइंडीज के खिलाफ ऐतिहासिक जीत के बाद भारत ने उसी साल इंग्लैंड का दौरा किया. इस जमीन पर भारत को पिछले 3 दौरों में एक भी जीत नहीं मिली थी. लेकिन जैसे वेस्टइंडीज में इतिहास बदला, वैसे ही इंग्लैंड में भी बदला. वाडेकर की कप्तानी में भारत ने 3 मैचों की सीरीज के पहले 2 मैच ड्रॉ कराए और फिर ओवल में हुआ आखिरी मैच जीतकर इंग्लैंड में न सिर्फ पहला टेस्ट जीता, बल्कि पहली सीरीज जीतने में भी सफलता हासिल की.
समर ऑफ 42 और संन्यास

वाडेकर की कप्तानी में भारत ने एक बार फिर 1972-73 में इंग्लैंड को 2-1 से सीरीज में हराया. ये सीरीज भारत में ही खेली गई थी. इस तरह लगातार 3 सीरीज जिताने के बाद वाडेकर की कप्तानी का लोहा माना जाने लगा. लेकिन 1974 के इंग्लैंड दौरे ने सब बदल दिया. ये वाडेकर की चौथी सीरीज थी और यही वह सीरीज थी, जिसमें भारत ने अपना सबसे छोटा टेस्ट स्कोर 42 रन (दिसंबर 2020 से पहले तक) बनाया था. भारत 3-0 से टेस्ट सीरीज हार गया. इस दौरे को ‘समर ऑफ 42’ कहा गया और लगातार 3 सीरीज जीतने वाले कप्तान को एक हार के बाद BCCI ने हटा दिया. न सिर्फ कप्तानी से हटाया गया बल्कि टीम से भी बाहर कर दिया गया. मजबूरी में वाडेकर को संन्यास लेना पड़ा.

ऐसा रहा वाडेकर का करियर

वाडेकर का टेस्ट करियर ज्यादा लंबा नहीं चला. करीब 8 साल के करियर में उन्होंने सिर्फ 37 टेस्ट मैच खेले. इसमें उनके नाम 1 शतक और 14 अर्धशतक समेत 2113 रन हैं. उनका औसत भी सिर्फ 31 का रहा, लेकिन सौरव गांगुली के आने से पहले तक वह भारत के अकेले बाएं हाथ के बल्लेबाज थे, जिसने टेस्ट में 2000 से ज्यादा रन बनाए थे. फर्स्ट क्लास करियर में उनका रिकॉर्ड ज्यादा शानदार था. यहां उन्होंने 237 मैचों में 15380 रन बनाए, जिसमें 36 शतक थे और 47 का औसत था. वाडेकर का 15 अगस्त 2018 को 77 साल की उम्र में निधन हो गया.

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