कभी 8 लाख के कर्जे में डूबा था परिवार, आज 15 लाख महीना कमाकर पिलाते हैं लोगों को चाय

चाय! आज हमारे जीवन का ऐसा अभिन्न हिस्सा बन चुकी है जिसके बिना रहना शायद थोड़ा मुश्किल है| सुबह उठने के बाद चाय, दोपहर में काम के बाद चाय, दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाते हुए चाय, सर्दी के मौसम में गरमागरम चाय, या फिर बारिश के मौसम में पकोड़ो के साथ चाय| कहीं न कहीं कुछ लोगों की पूरी दिनचर्या चाय के इर्द-गिर्द घूमती है| लेकिन चाय यदि येवले की हो तो ये तो सोने पर सुहागा वाली बात होगी| आज कहानी एक चाय की जिसने बदल दी एक ऐसे व्यक्ति की ज़िंदगी जो कभी 8 लाख के कर्ज़ में डूबा था|




येवले अमृततुल्य! क्या हुआ आ गया न मुँह में पानी| येवले अमृततुल्य चाय की एक ऐसी ब्रांड जिसके नाम को सुनकर अच्छे-अच्छों के मुँह में पानी आ जाए| यूं तो येवले अमृततुल्य की शाखा कई जगहों पर हैं, लेकिन जब भी कोई पुणे जाता है तो येवले की चाय पीना नहीं भूलता| येवले अमृततुल्य आज लाखों दिलों पर राज कर रही है लेकिन इसके पीछे येवले अमृततुल्य के मालिक नवनाथ येवले की कड़ी मेहनत छुपी हुई है| यूं ही किसी ने येवले अमृततुल्य को नहीं स्वीकारा इसके पीछे येवले ब्रदर्स का संघर्ष छुपा हुआ है| आइए जानते हैं येवले अमृततुल्य की कहानी|

नवनाथ करना चाहते थे पिता का सपना पूरा

येवले अमृततुल्य का सफर 1983 से शुरू हुआ जब नवनाथ के पिता ने श्री गणेश अमृततुल्य के नाम से चाय की दुकान खोली| नवनाथ के पिता हमेशा से चाहते थे कि उनके परिवार के नाम से बाज़ार में कोई तो समान या प्रॉडक्ट होना चाहिए| उसके कुछ समय तक श्री गणेश अमृततुल्य अच्छा चला लेकिन कुछ समय बाद नवनाथ के पिता जी का देहांत हो गया और सारा दारोमदार नवनाथ और उनके भाइयों पर आ गया| उनके पिताजी के मरने के बाद उनके परिवार पर 8 लाख का कर्जा था जिसके लिए उन्होंने अपने पापा की चाय की दुकान पर काम करने का ठाना और उन्होंने सारे कर्मचारी बाहर कर दिये ताकि पैसे को बचाया जा सके| साथ ही नवनाथ अपने पिता का सपना भी पूरा करना चाहते थे|

बाज़ार के विश्लेषण से आया विचार और खोल दिया येवले अमृततुल्य

कुछ समय में ही नवनाथ ने श्री गणेश अमृततुल्य में काम करके 8 लाख का कर्जा भी चुका दिया था, लेकिन अब समय था अपने पिता के सपने को पूरा करने का, जिसके लिए उन्होंने बाज़ार का विश्लेषण करना शुरू कर दिया| उनके चाचा ने कहा कि क्यूँ न हम चाय का ही बिज़नस करें| नवनाथ तैयार हो गए और बाज़ार में अनेकों चाय वालों का विश्लेषण किया| विश्लेषण में उन्होंने पाया कि जो चाय लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा है उसी से लोग नाइंसाफी करते हैं और लोगो को गंदे कप, और खराब क्वालिटी वाली चाय पिलाते हैं| साथ ही लोगों का चाय के प्रति आकर्षण भी नवनाथ को भा गया| बस फिर क्या था नवनाथ ने इसी विश्लेषण के निष्कर्ष को अपना हथियार बना लिया और पुणे में येवले अमृततुल्य की पहली ब्रांच खोल दी| जोकि लोगों को बहुत पसंद आई| साथ ही नवनाथ ने अपने पिता का सपना भी पूरा किया|

येवले अमृततुल्य की हैं 100 ब्रांच, दिल्ली में भी ब्रांच खोलने की तैयारी

नवनाथ ने बताया कि येवले अमृततुल्य कि आज 100 ब्रांच हैं साथ ही दिल्ली में भी येवले अमृततुल्य की ब्रांच खोलने की तैयारी चल रही है| साथ ही आज येवले के रोजाना 2000 से 2500 तक कप बिक जाते हैं| नवनाथ ने बताया कि एक आउटलेट से उन्हें 5 से 6 लाख तक की कमाई हो जाती है और ऐसे नवनाथ के 3 आउटलेट हैं|


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